हममें से ज़्यादातर लोग हवा को आंखों से तौलते हैं और आदतों के आधार पर समझते हैं। यही वजह है कि प्रदूषण का संकट सामने होने के बावजूद उसका सही आकलन नहीं हो पाता। असली चुनौती यह है कि जब हमें प्रदूषण जैसे मौन हत्यारे से लड़ना होता है, तो मिथक हमारे रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बन जाते हैं। दिल्ली की हवा पर होने वाली चर्चा इसका स्पष्ट उदाहरण है। आम तौर पर यह धारणा बना दी गई है कि खराब हवा केवल दिल्ली की समस्या है, जबकि ऐसा मानना हमें तथ्यों से दूर ले जाता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की AQLI रिपोर्ट साफ बताती है कि इंडो-गैंगेटिक प्लेन, जहाँ करोड़ों लोग रहते हैं, दुनिया के सबसे प्रदूषित इलाकों में से एक है। यही वह हवा है जो लोगों की औसत आयु को वर्षों तक घटा देती है, फिर भी आम बातचीत अक्सर दिल्ली तक ही सिमट जाती है। यह सीमित सोच कई बार नीतियों को भी सही दिशा में आगे बढ़ने से रोक देती है। ऐसे में मिथकों को तोड़ना और हवा को विज्ञान के आधार पर समझना सबसे ज़रूरी कदम बन जाता है।